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CAG रिपोर्ट कैसे बनती है, किनका होता है ऑडिट? समझें सबकुछ

दिल्ली में नवगठित विधानसभा का सत्र शुरू हो चुका है। एलजी वीके सक्सेना ने प्रोटेम स्पीकर अरविंदर सिंह लवली को शपथ दिलाई। इसके बाद वह विधायकों को शपथ दिला रहे हैं। इस सत्र में विधानसभा स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चुनाव भी होना है। इसी बीच, दिल्ली की नई मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि 27 फरवरी तक चलने वाले इस सत्र में CAG (कैग) की पेंडिंग सभी 14 रिपोर्ट पेश की जाएंगी। इन रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार की शराब नीति के कारण दिल्ली को 2,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ है।

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क्या है CAG रिपोर्ट की ताकत?

CAG यानी नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General)। यह भारतीय संविधान के तहत बनाई गई एक स्वतंत्र संस्था है, जिसका काम सरकार के खर्च और आमदनी पर नजर रखना है। CAG की रिपोर्ट इतनी ताकतवर होती है कि इसने कई बार सरकारों की नींद उड़ा दी है। लेकिन सवाल यह है कि CAG कैसे काम करता है? क्या सरकार इसकी रिपोर्ट को नजरअंदाज कर सकती है? आइए जानते हैं।

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CAG की नियुक्ति कैसे होती है?

CAG की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते हैं। यह पद संविधान के अनुच्छेद 148 के तहत बनाया गया है। CAG को हटाने की प्रक्रिया भी सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जितनी ही कठिन है। यानी सरकार चाहकर भी CAG को आसानी से हटा नहीं सकती। CAG का वेतन और सेवा शर्तें संसद द्वारा तय की जाती हैं। इसके अलावा, CAG के कार्यालय का सारा खर्च भारत के कंसोलिडेटेड फंड से होता है, जिससे सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होता।

CAG रिपोर्ट कैसे करता है काम?

CAG का मुख्य काम सरकारी विभागों और संस्थाओं का ऑडिट करना है। यह दो तरह के ऑडिट करता है:

  1. रेग्युलेरिटी ऑडिट (नियमित ऑडिट): इसमें यह देखा जाता है कि सरकारी खर्च नियम और कानून के मुताबिक हुआ है या नहीं।
  2. परफॉर्मेंस ऑडिट: इसमें यह जांचा जाता है कि सरकारी योजनाओं को सही ढंग से लागू किया गया है या नहीं और क्या उनका मकसद पूरा हुआ है।

किनका होता है ऑडिट?

CAG केंद्र और राज्य सरकारों के सभी विभागों, कार्यालयों और सरकारी कंपनियों का ऑडिट करता है। इसमें रेलवे, डाक और संचार विभाग जैसे बड़े विभाग भी शामिल हैं। सरकारी फंड से चलने वाली करीब 1,500 कंपनियां और 400 स्वायत्त संस्थाएं CAG के दायरे में आती हैं।

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CAG रिपोर्ट कहां जाती है?

CAG अपनी रिपोर्ट संसद और राज्य विधानसभाओं को सौंपता है। इन रिपोर्ट्स को पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (PAC) और कमेटी ऑन पब्लिक अंडरटेकिंग्स (COPU) जैसी समितियों में विस्तार से जांचा जाता है। अगर रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो इसे संसद या विधानसभा में चर्चा के लिए रखा जाता है।

क्या सरकार CAG रिपोर्ट को नजरअंदाज कर सकती है?

तकनीकी तौर पर, सरकार CAG रिपोर्ट को मानने के लिए बाध्य नहीं है। लेकिन, इसकी रिपोर्ट इतनी ताकतवर होती है कि इसे नजरअंदाज करना सरकार के लिए मुश्किल हो जाता है। CAG की रिपोर्ट ने कई बार सरकारों की मुश्किलें बढ़ाई हैं।

कब-कब CAG ने बढ़ाई सरकारों की मुश्किलें?

  1. केशुभाई पटेल का इस्तीफा: साल 2001 में CAG ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल पर विदेश यात्राओं में फिजूलखर्ची का आरोप लगाया। इसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
  2. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला: 2010 में CAG ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में 1.76 लाख करोड़ रुपए के घोटाले का खुलासा किया। इसके बाद तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा को गिरफ्तार कर लिया गया।
  3. रामविलास पासवान का मामला: 1989 में CAG ने रिपोर्ट दी कि केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने घर सजाने के लिए तय बजट से ज्यादा पैसे खर्च किए। इससे तत्कालीन वीपी सिंह सरकार कठघरे में आ गई।

दिल्ली सरकार पर CAG रिपोर्ट का असर

दिल्ली सरकार की शराब नीति पर CAG की रिपोर्ट ने AAP को बड़ी मुश्किल में डाल दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, शराब नीति के कारण दिल्ली को 2,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ है। अब देखना यह है कि इस रिपोर्ट का दिल्ली सरकार पर क्या असर होता है।