इलाहाबाद HC की ‘ब्रेस्ट पकड़ना रेप नहीं’ वाली टिप्पणी पर SC की रोक, बताया असंवेदनशील और अमानवीय

इलाहाबाद हाईकोर्ट की ‘ब्रेस्ट पकड़ना रेप नहीं’ वाली टिप्पणी अब सुप्रीम कोर्ट के सामने आ पहुंची है। बता दें कि इस बयान ने देशभर में हंगामा मचा रखा है। जिसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वत: संज्ञान में ले लिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता के पत्र के बाद जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने आज इसकी सुनवाई की। जिसमें SC ने इस टिप्पणी को असंवेदनशील और अमानवीय बताकर खारिज कर दिया है। वहीं  इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। आइए, इस पूरे मामले को आसान लहज़े में समझते हैं।

मामला क्या है? “लिफ्ट से पुलिया तक”

दरअसल 2021 में उत्तर प्रदेश के कासगंज में पवन और आकाश नाम के दो लोगों पर एक नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ और रेप की कोशिश का आरोप लगा। कहानी कुछ यूँ है कि दोनों लड़कों ने लड़की को मोटरसाइकिल पर लिफ्ट दी। रास्ते में उसका “ब्रेस्ट पकड़ा,” पायजामे का नाड़ा तोड़ा और उसे पास की पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की। लड़की चीखी, कुछ राहगीर आए, और आरोपी भाग गए। पुलिस ने IPC की धारा 376 (रेप) और POCSO एक्ट के तहत केस दर्ज किया। निचली अदालत ने समन जारी किया, लेकिन आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी। उनका कहना था कि ये धाराएँ उनके कृत्य से मेल नहीं खातीं।

इलाहाबाद HC का फैसला: “रेप नहीं, बस उत्पीड़न”

17 मार्च 2025 को जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि ब्रेस्ट पकड़ना, नाड़ा तोड़ना, और खींचना ये हरकतें रेप या रेप की कोशिश नहीं हैं। जज का तर्क था कि रेप का प्रयास साबित करने के लिए अभियोजन को यह दिखाना होगा कि आरोपी का इरादा “तैयारी” से आगे बढ़कर “प्रयास” तक पहुँचा था। यहाँ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने धारा 376 और POCSO की धारा 18 (रेप की कोशिश) हटाकर IPC की धारा 354(B) (नंगा करने का इरादा) और POCSO की धारा 9/10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) लगाने का आदेश दिया। इस टिप्पणी ने तूफान खड़ा कर दिया—लोगों ने इसे असंवेदनशील और खतरनाक बताया।

सुप्रीम कोर्ट का पहला रुख: “लेक्चरबाजी नहीं चलेगी”

इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में वकील अंजलि पटेल ने जनहित याचिका दायर की। माँग थी कि कोर्ट इस “विवादित हिस्से” को हटाए और जजों के लिए दिशानिर्देश बनाए। लेकिन 24 मार्च को जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने इसे खारिज कर दिया। जस्टिस त्रिवेदी ने वकील को टोका, “अदालत में लेक्चरबाजी मत करिए।” कोर्ट ने कहा कि वह इस पर विचार नहीं करना चाहता। यह तकनीकी आधार पर खारिज हुई, क्योंकि याचिकाकर्ता मौजूद नहीं थीं।

शोभा गुप्ता की चिट्ठी के बाद आया नया मोड़

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद मामले में फिर आया ट्विस्ट। दरअसल वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता, जो ‘वी द वूमेन ऑफ इंडिया’ की संस्थापक हैं, ने सुप्रीम कोर्ट को चिट्ठी लिखी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने इस टिप्पणी को लेकर चिंता जताई और नाबालिगों की सुरक्षा पर सवाल उठाए। इस पत्र ने सुप्रीम कोर्ट को हरकत में लाया। 25 मार्च को कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और कहा कि वह इसकी जाँच करेगा। जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने इसे “संवेदनशीलता की कमी” वाला फैसला बताया और सुनवाई के लिए 26 मार्च की तारीख तय की।

विवाद क्यों? “कानून vs संवेदनशीलता”

यह टिप्पणी क्यों भड़काऊ बनी? बता दें कि कानूनन रेप (IPC 375) में पेनिट्रेशन की क्रिया का होना ज़रूरी होता है और रेप की कोशिश (IPC 511) के लिए साफ इरादा और कदम दिखाना पड़ता है। जिसके चलते हाईकोर्ट ने इसे “तैयारी” माना, “प्रयास” नहीं। लेकिन POCSO एक्ट यौन इरादे से छूने को ही अपराध मानता है—फिर भी रेप की धारा क्यों हटी? कई कानूनविदों का कहना है कि यह फैसला तकनीकी रूप से सही हो सकता है, मगर नाबालिगों के खिलाफ अपराधों को हल्का दिखाता है। सुप्रीम कोर्ट का 2021 का फैसला (बॉम्बे हाईकोर्ट के “स्किन टू स्किन” मामले को पलटते हुए) कहता है कि यौन इरादे से छूना ही POCSO में अपराध है।

सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?

26 मार्च को सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि क्या हाईकोर्ट का फैसला POCSO और IPC की मंशा के खिलाफ है। क्या यह नाबालिगों की सुरक्षा को कमज़ोर करता है? कोर्ट हाईकोर्ट के ऑब्जर्वेशन पर रोक लगा सकता है या दिशानिर्देश जारी कर सकता है। यह भी मुमकिन है कि जजों की टिप्पणियों पर नई गाइडलाइंस बनें।

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